Monday, February 1, 2010

सबकुछ याद है....

कुछ मिटटी और कुछ ईंट की वो इमारत ,
वो रास्ते जिनपर कभी दौडा करते थे ,
सबकुछ याद है ।

गंवई गाँव के लोग कितने भले लगते थे ,
सीधा सपाट जीवन , कही मिलावट नही ,
दूर - दूर तक खेत , जिनमे गाय -भैसों को चराना ,
वो गोबर की गंध व भैसों को चारा डालना ,
सबकुछ याद है ।

गाय की दही न सही , मट्ठे से ही काम चलाना ,
मटर की छीमी को गोहरे की आग में पकाना ,
सबकुछ याद है ।

वो सुबह सबेरे का अंदाज , गायों का रम्भाना ,
भागते हुए नहर पर जाना और पूरब में लालिमा छाना ,
सबकुछ याद है ।

बैलों की खनकती हुई घंटियाँ , दूर - दूर तक फैली हरियाली ,
वो पीपल का पेड़ और छुपकर जामुन पर चढ़ जाना ,
सबकुछ याद है ।

Friday, January 15, 2010

अँधेरी रात ...

एक मोमबती ले निकली हूँ । घुप अँधेरी रात है ।
मेरे लिए नही यह कोई नई बात है । सारे जग में कर दूंगी उजाला ।
हिम्मत है तो रोक कर दिखाओं ।

Saturday, January 2, 2010

नव वर्ष.........

सभी मित्रों को नव वर्ष की शुभकामना ,
हम सब नव वर्ष में प्रवेश कर गए ,पर कुछ बदला नहीं वही सारी चीजें जो हमें परेशान करती रही है आगे भी करती रहेगी. इस साल भी ब्लेम गेम होगा और आम लोगों की जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया जायेगा .कोई और राठौर रुचिका को प्रताड़ित करेगा और छुट जायेगा .
ऐसे ही बम ब्लास्ट होते रहेंगे और हम आतंकियों की मेहमानवाजी में व्यस्त रहेंगें . ऐसे ही ग्लेसियर पिघलते रहेंगे और एक दिन तुवालु डूब जायेगा .डी डी सी ए में भ्रष्टाचार जारी रहेगा और ऐसे ही पिचें बनती रहेंगी .
चार दिन के आये ओबामा को नोबल प्राइज़ मिलता रहेगा , धरातल पर काम करने की जरुरत ही नहीं
........पर आशा है की कुछ अच्छे काम भी देखने को मिलेंगे ...नेता थोडा बहुत सकारात्मक होंगे और नयी पीढ़ी को मौका देंगे .

Friday, December 4, 2009

मजे के लिए बहते जाना उचित है क्या ?

जीवन की इस धारा में बहते चले जाना कभी कभी बहुत अच्छा भी लगता है ..पर कभी लगता है की इसी तरह बिना किसी प्रतिरोध के बहते रहना अच्छा नहीं है . ऐसा लगता है की इनर्जी ख़त्म होती जा रही है . उसे समेटना होगा और फिर प्रतिरोध भी करना होगा .
....पर क्या करे इस बहाव का भी अपना मज़ा है भले ही कोई उपलब्धि नहीं है ..पर  शान्ति बहुत है . क्या इस शान्ति को छोड़ कर आगे बढ़ जाऊं . हाँ यही सही रहेगा ..पर फिर शान्ति की लालच आ ही जाती है ....बहुत बुरी आदत है ..पर मजेदार आदत है ....आप ही बताओ ज़िन्दगी ऐसे चलती है भला ! मजे के लिए बहते जाना उचित है क्या ?

Thursday, November 26, 2009

नाटक ....

कोई सिर्फ़ गजरे से घर सजाना चाहता है तो किसी को आकाश ही चाहिए । किसी को कम पर संतोष नही ...सब एक दुसरे को धोखा देने में लगे है । हर कोई दिखावा ही कर रहा ...सादगी तो जैसे बहुत पीछे .....!
किसी के लिए रिश्ते नाते सब नाटक है ...इसी बहाने लूटने का मौका मिल जाता है ....ओह !अग्नि के सात फेरे का कोई मोल नही ....
देह को लाल पिला करना ही आधुनिकता हो गई ...सबको हो क्या गया है !अबूझ पहेली .....हद हो गई है ।
....कोई रोकता क्यों नही ,रोकने वाले भी तो मिलावटी हो गए है ।

Monday, November 16, 2009

क्या दिखावा है !

वाह !
एकदम रंगीन
इतने पारंगत
नक़ल भी छिप गया
इसे कहते है ...कलाकारी

सच !
हम एक रंगमंच पर
नाच रहे
अपनी अपनी
कला को बेचकर
क्या दिखावा है !

Sunday, November 1, 2009

सब हंस रहे है ...

हंसों
खूब हंसों
सब हंस रहे है
तुम पीछे हो !
अपने
बेगाने
नए
पुराने
सब हंस रहे है
और
तुम पीछे हो !

वादा ...

वादा ...नफरत हो गई । इसने तो मुझे सबसे ज्यादा तोडा है । मेरी दुनिया को उजाड़ कर रख दिया । अब नही करता । किसी से भी नही ....अपने आप से भी नही ।

ज़माना बदल गया !

अब घोडें कम दीखते है । फिल्मों में भी नहीं । उनका भी एक ज़माना था । शान से दौड़ते थे । ....पर अब क्या काम ?
बेचारें । रहेगें कहाँ ? हमने तो जगह छोड़ी ही नहीं ।

भीड़ ...

अकेले ही रहना है । भीड़ नही ....मौलिकता को खा जाती है । सोचना अकेले ही है ....हिस्सेदारी नहीं करनी ।