Thursday, November 26, 2009

नाटक ....

कोई सिर्फ़ गजरे से घर सजाना चाहता है तो किसी को आकाश ही चाहिए । किसी को कम पर संतोष नही ...सब एक दुसरे को धोखा देने में लगे है । हर कोई दिखावा ही कर रहा ...सादगी तो जैसे बहुत पीछे .....!
किसी के लिए रिश्ते नाते सब नाटक है ...इसी बहाने लूटने का मौका मिल जाता है ....ओह !अग्नि के सात फेरे का कोई मोल नही ....
देह को लाल पिला करना ही आधुनिकता हो गई ...सबको हो क्या गया है !अबूझ पहेली .....हद हो गई है ।
....कोई रोकता क्यों नही ,रोकने वाले भी तो मिलावटी हो गए है ।

10 comments:

  1. Ye saty kewal aajka nahi..sadiyon ka hai...insani zehniyat aaj kal medeake karan saamne aa rahee hai, itnaahi bhed hai!

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  2. सत्य कि अभिव्यक्ति है .... दर्द को लिखा है आपने ..

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  3. sahi hai rishte sirf natak hai..patr badal jate hai bas.....

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  4. क्या बात हो गयी मार्क जी बहुत गुस्से में लग रहे हैं आज तो ...????

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  5. man ka dard saaf jhalk raha hai... is dard ko banaye rakhe..

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  6. jaane kab se apne darp ya matlab ke chalte yeh dard yeh haal hum sah rahe hain.......

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  7. सब कुछ बदल रहा है भाई..सही नही है पर यही आज की दुनिया है बहुत कम ही लोग है जो रोकने का प्रयास करते है..वैसे भी कौन रुके आधुनिकता में डूबे सब बहक गये है...वैसे बात आपने बहुत सही रखी है..

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