Saturday, October 3, 2009

यादें ......

यादें ....उफ्फ ये यादें । ज़िन्दगी भर का दर्द ...और गम । कभी दिन के उजालें में तो कभी रात के अन्धेरें में । कभी मेले में तो कभी वीराने में हलचल ...
उफ्फ ये यादें .....मानो जीवन भर साथ निभाने का ठेका ले रखा है ।
क्या करूँ ...अब तो इस बेचारे पर उसे दया भी नही आती ।
सच ! सोच कर ही काँप जाता हूँ ....उफ्फ ये यादें ।

Saturday, September 19, 2009

मेरी ज़िन्दगी में कुछ भी खुबसूरत नही

....अपने को ही पहचान न सका
....और भटक गया
मेरी ज़िन्दगी में कुछ भी खुबसूरत नही
..जो कुछ था उसे भी बहता पाया
....अपने को ही पहचान न सका

दर्द के वीराने में .....
भटकता ही रह गया
कुछ ढूढता ही रह गया
....और एक कंकड़ भी न पा सका

......एक इंसान हूँ

मै तुम्हारी तरह... जाने वालो
जरा
मुड के देखो मुझे .......एक इंसान हूँ ।
.....................पर मेरी आवाज किसी ने नही सुनी ।
.................कांपती हुई आवाज विलीन हो गई ।
................मै ठगा देखता ही रह गया और कारवां निकल गया ।
...........शायद मेरी किस्मत ने मुझे धोखा दे दिया
.........और मै एक नाकामयाब इंसान बन गया ।

Friday, September 4, 2009

किस्मत .....

किस्मत सो गई .... आखे थक गई । अब जाओ ..... मै भी जा चुका । अब मुझे तन्हा रहने दो । मुझे मजाक बनने दो .... तुमसे कोई शिकायत नही । गलती मेरी है । इतना चाहा । सारा जीवन दे दिया । अब मेरी शाम आ गई है तो तुम भी ...
पागल था । तेरी मुस्कुराहटों का । जागता था रातभर तुमको यादकर ..... तुमने अपनी अदाओं से जादू कर दिया ।
मै खिचता चला गया । तू मेरी मंजील थी । अब मै क्या राहें भी थक गई पर तेरा दर्शन नही हुआ । अब मै जा रहा हूँ ...... सबको छोड़कर ।

Tuesday, September 1, 2009

क्यों ?

रंगीली दुनिया कभी बेरंग क्यों लगती है ?
ज़िन्दगी इतनी छोटी है ,फ़िर लम्बी क्यों लगती है ?
इंसान दयालु से हैवान कैसे बन जाता है ?
कोई क्यों किसी को छोड़ कर चला जाता है ?
.....अंत में सब शून्य ही क्यों दीखता है ?

Monday, August 17, 2009

हाय ...वो पल .....

कुछ ख़ास था
वो पल
आसमान में लालिमा
आंखों में आईना
प्रेम का ये जहाँ
एक बाग़ में हम
और मुहब्बत की तितली
जब तुम मिली .........
हाय ..वो पल ...

Friday, July 17, 2009

मेरा जहाँ ...

अपना जहाँ ख़ुद ही खो दिया
अब भटक रहा हूँ
कैसे ?खो दिया
ये भी पता नही
साँसे थम गई
आवाज......
वो भी गुम हो गई
मेरी मंजिल तो मिली नही
दुसरे का ढूढ़ रहा हूँ
अपने ही घर में आग लगाया
अब पानी खोज रहा हूँ
अँधेरी रात को अपनाया
और भटक गया
अब चाँद से उजाला मांग रहा हूँ
अपना जहाँ ख़ुद ही खो दिया
अब भटक रहा हूँ

Tuesday, July 7, 2009

पुआल

पुआल को देखे ज़माना हो गया । बचपन में देखा था । क्या दिन थे....पुआल पर ही खाना और सोना भी होता था । खूब जमकर खेलते और कूदते थे ।
आज तो सिंथेटिक का ज़माना है । उस बेचारे का क्या काम ?आज तो गाय बैलों को भी नशीब नही होता ...हमें कैसे होगा ?
हाँ जिस दिन सिंथेटिक हमें ले डूबेगा उस दिन उसकी बहुत याद आनेवाली है ।

Saturday, July 4, 2009

कोई गम क्यों नही ?

इन्तजार करना नही
अनुसरण का स्वभाव नही
कोई गिला शिकवा नही
कोई वादा भी नही
उपहास करना आदत नही
और सुनना भी नही
बहुत निराशा भी नही
ज्यादा आस भी नही
तब क्यों कुछ ठीक नही ?
बोझिल मन और भारी कदम है
लगता दिल में कोई गम है
कुछ तो हुआ है ?
जिंदगी ठहर सी गई है
उमंगें लूट सी गई है
गम होकर भी लगता ,
कोई गम नही
यही तो सबसे बड़ा गम है ,
कोई गम क्यों नही ?

Friday, June 26, 2009

ईर्ष्या

कमजोर स्वाभिमान को देखना हो तो ईर्ष्या करो । आपकी अंतरात्मा हिल जायेगी । सारे गुण धुल जायेंगे । दुसरे का नुक्सान हो या न हो पर आपका तो पक्का होगा । शायद आगे की राह बंद हो जाय । शायद नही........ऐसा जरुर होगा । जब चरित्र ही ईर्ष्या करना शुरू कर दे ,तब पतन निश्चित है । यह भावी पीढियों के लिए भी नासूर बन जाएगा । इर्ष्या आपको भ्रष्टता की कब्र में धकेल देगा .......आप इसका दामन छोड़ दे ।