Saturday, September 19, 2009

मेरी ज़िन्दगी में कुछ भी खुबसूरत नही

....अपने को ही पहचान न सका
....और भटक गया
मेरी ज़िन्दगी में कुछ भी खुबसूरत नही
..जो कुछ था उसे भी बहता पाया
....अपने को ही पहचान न सका

दर्द के वीराने में .....
भटकता ही रह गया
कुछ ढूढता ही रह गया
....और एक कंकड़ भी न पा सका

13 comments:

  1. dil me aarzoo rakhiye jaroor pa lenge..kankad kya karenge.....kuchh or dhondiye...

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  2. दर्द के वीराने में .....
    भटकता ही रह गया
    कुछ ढूढता ही रह गया
    ....और एक कंकड़ भी न पा सका nice

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  3. Y r u so pessimistic yaar??? Is dunia me wahi nahi paata jo paana nahi chahta to agar aap kuchh pa nahi rahe hain zindagi se to ya to aap prayaas nahi kar rahe dil se yaa aapki paane ki laalsa khatam ho chuki h...

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  4. Can i've ur ID...i wanna interact with u...

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  5. बहुत सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये रचना बहुत अच्छी लगी!

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  6. दर्द के वीराने में .....
    भटकता ही रह गया
    कुछ ढूढता ही रह गया
    ....और एक कंकड़ भी न पा सका ...

    इतने सारे ब्लोगरों का प्रेम क्या कम है .....??

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  7. sir jee aap kabhee nhi bhatak sakte hai kyonki aap to hum sab ko rasta dikhate hai

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  8. कुछ ढूढता ही रह गया
    ....और एक कंकड़ भी न पा सका

    - आशान्वित रहिये. प्रयत्न करते रहिये, कंकड़ नहीं हीरा मिलेगा.

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  9. कुछ ढूढता ही रह गया
    और एक कंकड़ भी न पा सका .........

    YE TO JEEVAN KA NIRANTAR PRAVAAH HAI .... UMEED JAGI RSHNI CHAHIYE ... KARM KARTE RAHNA CHAHIYE ... SAFALTA MILEGI .... SUNDAR LIKHA HAI ..

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