Tuesday, July 30, 2013

ऐसे माहौल में कोई क्यों इमानदार बनेगा ?

 गौतम बुद्ध नगर की  एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल को यूपी की अखिलेश सरकार ने सस्पेंड कर दिया। यूपी के सरकारी प्रवक्ता के मुताबिक काम में लापरवाही के चलते कारवाई की गई है।  सरकार ने इस निलंबन पर सफाई दी है कि दुर्गा सांप्रदायिक सौहार्द्र कायम रखने में नाकाम रही हैं।लोगों का मानना है कि खनन माफिया के दबाव में यह कार्रवाई की गयी और यह गलत हुआ।इस निर्णय से सरकार की कार्य प्रणाली पर सवाल उठते है।ऐसा प्रतीत होता है की सरकारें  ऐसे लोगों की कठपुतली होती जा रही है जो अवैध कार्यों में लगे हुए है।

 नागपाल 2009 बैच की आईएएस ऑफिसर हैं। कुछ हफ्तों से ग्रेटर नोएडा में अवैध खनन पर लगाम कसने के लिए नागपाल युद्धस्तर पर काम कर रही थीं। उन्होंने यमुना नदी से रेत से भरी 300 ट्रॉलियों को अपने कब्जे में किया था। नागपाल ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यमुना और हिंडन नदियों में खनन माफियाओं पर नजर रखने के लिए विशेष उड़न दस्तों का गठन किया था। नागपाल ने सस्पेंड होने से पहले ही कहा कि था इन माफियाओं पर कार्रवाई की वजह से धमकियां मिलती हैं।

कई स्थानों पर तो खनन माफियाओं की शक्ति इतनी बढ़ गयी है की वे सम्बंधित अधिकारियों को जान से मारने की धमकी देते रहते है और बंधक भी बना लेते है।  उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार को लोगों ने बहुमत देकर विधान सभा में भेजा और यह उम्मीद किया क़ि  अखिलेश यादव के नेतृत्व में इस बार एक ऐसी सरकार बनेगी जो पिछली सरकारों से अलग होगी लेकिन अभी तक इस सरकार ने ऐसा कोई भी काम नहीं किया है जिससे की लोगों को यह भरोसा  हो सके की यह सरकार दूसरी  सरकारों से अलग है।

उत्तर प्रदेश सरकार बीते डेढ़ साल में आधा दर्जन आईएएस अफसरों के खिलाफ एकतरफा कार्रवाई कर चुकी है. यह सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है. ऐसे में जरूरी है कि मुख्यमंत्री अब अपनी कार्यप्रणाली बदलें. विपक्षी दलों के नेताओं और सेवानिवृत नौकरशाहों ने भी दुर्गाशक्ति के निलंबन को लेकर मुख्यमंत्री के फैसले पर कुछ ऐसे ही सवाल खड़े किए हैं.
 ईमानदार अफसर को इस तरह से अच्छा काम करने के एवज में हटाया जाएगा तो अफसरों में क्या सन्देश जाएगा?  दुर्गा नागपाल को सिविल सर्विसेज नियमावली के विपरीत हटाया गया है. किसी आईएएस अफसर को हटाने से पहले कम से कम उसकी कोई जांच करायी जानी चाहिए थी. इसके अलावा कम से कम डीएम से रिपोर्ट तो ली ही जानी चाहिए थी. बगैर डीएम की रिपोर्ट के ही उन्हें हटा दिया गया.

दुर्गा शक्ति का दोष इतना बड़ा नहीं था की उन्हें इसके लिए निलंबित किया जाय।  इससे जो लोग निर्भय होकर काम करना चाहते है उन्हें निराशा होगी और वे हतोत्साहित होगें।  बच्चों को किताबों में पढाया जाता है की इमानदार बनो , ऐसी घटनाओं से वे क्यों इमानदार बनाने की कोशिश करेंगें या और कोई भी क्यों इमानदार बनेगा जब सरकार ही माफियाओं के आगे घुटने टेक कर इमानदार लोगों को सजा दे रही हो।

Sunday, July 28, 2013

तेज़ाब को गुड बाय कहना ही होगा

आजकल की घटनाएं परेशान करती है …. लगातार कई लड़कियों पर तेज़ाब फेंक पर उनके जीवन को नर्क बनाया जा रहा है …. ऐसे लोग हमारे समाज को कलंकित कर रहे है … सरकार ने तेज़ाब की खुली बिक्री पर रोक लगाने का फैसला लिया है …यह कदम स्वागत योग्य है लेकिन सिर्फ इतने भर से तेज़ाब फेंकने की घटना पर अंकुश नहीं लगने वाला … जो भी व्यक्ति ऐसा करता है उसके खिलाफ ऐसी करवाई होनी चाहिए जिससे की वह दुबारा हिम्मत न कर सके. साथ ही तेज़ाब के विकल्प पर ध्यान देना चाहिए . जिन लड़कियों पर तेज़ाब फेंका जाता है , उनका जीवन नारकीय हो जाता है…वे सामान्य जीवन नहीं जी पाती . समाज और सरकार को उनके प्रति उदारता दिखानी होगी .
बाथरूम साफ करने के लिए तो टॉयलेट क्लीनर के नाम पर तेज़ाब 20-25 रुपए में ही मिल जाता है. दुकानों में हर किसी के लिए तेज़ाब की आसान उपलब्धि बंद हो ताकि उसकी तरह किसी और लड़की को अपनी ज़िंदगी यूँ न गुज़रानी पड़े- बिना आँखों के और पूरी तरह खराब हो चुके चेहरे के साथ.सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय पहले निर्देश भी दिया था कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों की बैठक बुलाई जाए ताकि तेज़ाब की बिक्री को रेगुलेट किया जा सके.
 केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में नियमों का जो मसौदा रखा, उसमें बताया गया है फ़ोटो पहचान पत्र और निवास प्रमाण के बिना तेज़ाब नहीं ख़रीदा जा सकेगा. यही नहीं, तेज़ाब की बिक्री के लिए दुकानदार को भी लाइसेंस लेना होगा.केंद्र सरकार ने अपने प्रस्ताव में यह भी कहा है कि अब
क्लिक करेंतेज़ाब को ज़हर की श्रेणी में रखा जाएगा.

 पॉइजन पजेशंस एंड सेल रूल्स में तेज़ाब को ज़हर की श्रेणी में रखने की बात कही गई है। इसे बेचने के लिए लाइसेंस लेना होगा और बिना फोटो पहचान पत्र लिए यह किसी को बेचा नहीं जाएगा। तेज़ाब खरीदने वाले को अपनी पहचान के अलावा खरीदने की वजह भी बतानी होगी। 18 साल से कम उम्र वालों को तेज़ाब नहीं बेचने का प्रावधान किया गया है। अभी टॉयलेट क्लीनर के नाम पर कोई भी व्यक्ति तेज़ाब खरीद सकता है।
तेज़ाब हमले की शिकार हुई दिल्ली की लक्ष्मी ने 2006 में खुले बाजार में तेज़ाब की बिक्री पर मुकमल पाबंदी लगाने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। जस्टिस आरएम लोढ़ा और जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि सरकार अभी सिर्फ गाइडलाइन का ड्राफ्ट  लेकर आई है। जब तक पॉलिसी बनेगी, तब तक देर हो जाएगी।

 वर्ष 2005 में एक युवक का प्रेम-प्रस्ताव देने के कारण दिल्ली की सोलह वर्षीया लक्ष्मी पर तीन युवकों ने तेज़ाब फेंक दिया। जिससे उसकी आंखें, नाक, कान, व गर्दन जल गए। हाथों पर गहरे जख्म हो गए। चेहरा इतना विकृत हो गया कि जब वह अपने घर लौटी तो वहां के सारे शीशे हटा दिए गए थे। उसकी सारी तस्वीरें भी हटा दी गई थी।

महिलाओं पर तेजाबी हमले के ऐसे कई उदाहरण हैं। हालांकि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो से ऐसे मामलों का स्पष्ट आंकड़ा नहीं मिल पाता क्योंकि ये मामले धारा 307 (हत्या का प्रयास), धारा 320 (गम्भीर चोट पहुंचाना) और धारा 326 (घातक हथियारों से जान-बूझकर प्रहार करके चोट पहुंचाने) के तहत दर्ज किए जाते हैं। तथापि कैम्पेन एण्ड स्ट्रगल अगेंस्ट एसिड अटैक्स ऑन विमेन' की एक रपट के अनुसार, सिर्फ कर्नाटक राज्य में ही 1999 से 2007 अर्थात, 9 वर्षों में ऐसे 56 मामले दर्ज किए गए। अनुमान है कि भारत में प्रति वर्ष तेजाबी हमले की 1000 घटनाएं घटती हैं पर रपट 100-150 की ही दर्ज हो पाती है। 18 से 40 वर्ष आयु वर्ग की 80 प्रतिशत महिलाएं विवाह और प्रेम प्रस्ताव को नकारने के कारण ऐसे हमले का शिकार होती हैं।

एसिड अटैक न सिर्फ किसी महिला के चेहरे को खराब कर देता है या उसकी आँखों की रोशनी छीन लेता है लेकिन उसे समाज में दोयम दर्जे का नागरिक बना देता है.जिस्म पर लगे घाव तो सबको दिखते हैं लेकिन ज़हन पर लगे घाव किसी को नज़र नहीं आते. आत्मनिर्भर और ज़िंदादिली से भरपूर एक औरत देखते ही देखते असहाय, दूसरों पर आश्रित महिला बन जाती है.  तेजाब के भयंकर दुष्प्रभावों को देखते हुए भी इसे हथियारों की तरह घातक माना ही नहीं गया है। जबकि दुकानों में दस-बीस रुपयों में खुले आम मिल जाने वाला तेजाब हथियार से भी अधिक घातक है। तेजाबी हमले से पीड़ित को आरंभिक दो-तीन बड़े ऑपरेशानों के बाद भी कई बाद 25-30 ऑपरेशन कराने पड़ सकते हैं, जिसका खर्च हर बार तीन लाख रुपये तक आता है। फिर भी, संक्रमण का ख़तरा सदैव बना रहता है क्योंकि हाइड्रोक्लोरिक एसिड, सल्फ्यूरिक एसिड और नाइट्रिक एसिड मनुष्य की त्वचा के साथ हड्डियों को भी गला देती है.

 वर्ष 2007 में नोएडा के एक सत्रह वर्षीय किशोरी पर पड़ोसी ने तेजाब से प्रहार किया। मैसूर में एक 22 वर्षीया गृहिणी को उसके पति ने सल्फ्यूरिक एसिड मिश्रित शराब पीने के लिए मजबूर किया और दिल्ली की एक फैशन डिज़ाइनर को ऐसे प्रहार का सामना करना पड़ा। उक्त तीनों महिलाएं जीवन की भयावहता से जूझने के लिए विवश कर दी गई। तब उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं पर तेज़ाब प्रहार को हत्या से बदतर बताते हुए उनसे निपटने के लिए कठोर कानून की मांग की थी।

  भारत में भी पिछले एक दशक में तेज़ाब हमलों में वृद्धि हुई है. स्वयंसेवी संस्था एसिड सरवाइवल ट्रस्ट इंटरनेशनल के मुताबिक भारत में हर साल एसिड अटैक के करीब 500 मामले होते हैं.कागज़ पर नीति तय होने, उसके कानून बनने और इसे कड़ाई से लागू होने के बीच लंबा समय लग जाता है. आज़ादी के बाद 60 सालों में इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार ही नहीं हुआ.

एसिड सर्वाइवर्स ट्रस्ट इंटरनेशनल के अनुसार दुनिया के करीब 23 देशों में हाल के वर्षों में एसिड हमलों की घटनाएँ हुईं. इनमें अमरीका, ब्रिटेन, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों के भी नाम हैं. लेकिन ये इन देशों में दूसरी जगहों की अपेक्षा हमलों की संख्या बेहद कम है. महिलाओं पर एसिड हमलों की सबसे अधिक घटनाएँ भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश के अलावा कंबोडिया में दर्ज की गई हैं.ईरान में 2004 में शादी के लिए मना करने पर 24 साल की अमेना पर एक लड़के ने तेज़ाब फेंक दिया था जबकि कंबोडिया में 23 की विवियाना पर एसिड अटैक में उनका चेहरा, हाथ और छाती जल गई थी.

 तेज़ाब हमले के मामले में भारत दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक देश है। वर्ष 1967 में बांग्लादेश में, 1982 में भारत में और 1993 में कम्बोडिया में तेज़ाब हमले की पहली घटनाएं घटी। यह सिलसिला कमोबेश निरन्तर जारी है। सरकार ने महिला हिंसा उन्मूलन हेतु प्रतिबध्दता तो दर्शायी, कानून भी बनाये लेकिन यह एक पहलू छूट गया। बाद में भी इस पर ध्यान  नहीं दिया गया। जबकि तेजाब के प्रहार से पीड़ित महिलाओं का पुनर्वास भी आसान नहीं है क्योंकि प्लास्टिक सर्जरी, त्वचा प्रत्यारोपण या पुन: त्वचा उगाना न केवल बहुत महंगा है बल्कि इसमें सफलता की संभावनाएं भी क्षीण हैं।

तेजाब की खुली बिक्री रोकने को लेकर सात साल से चल रहे केस में सुप्रीम कोर्ट ने 18 जुलाई 2013 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने तेजाब की खुली बिक्री पर प्रतिबंध और पीडि़त को तत्काल आर्थिक सहायता देने के आदेश दिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में तेज़ाब बेचने और खरीदने से जुड़े सभी नियम-कायदे गुरुवार से ही लागू कर दिए। अदालत ने कहा कि यदि बिना पहचान-पत्र देखे तेज़ाब बिका तो पॉइज़न एक्ट 1919 के तहत केस चलेगा। सजा होगी। अब खुले बाजार में वही तेज़ाब बेचा जाएगा, जो त्वचा पर बेअसर हो। जस्टिस आरएम लोढ़ा और जस्टिस फकीर मोहम्‍मद की बेंच ने राज्य सरकारों को आदेश दिया कि वे तेज़ाब हमों को गैर-जमानती अपराध बनाएं। कोर्ट ने सरकारों को तीन महीने के भीतर इस बारे में पॉलिसी लाने के निर्देश दिए।

तेजाब का असर-

हाइड्रोक्लोरिक एसिड, सल्फ्यूरिक एसिड, नाइट्रिक एसिड इंसान की त्वचा के साथ हड्डियां तक गला देती हैं। यानी पीडि़त के लिए दर्दनाक और देखने वालों के लिए असहनीय।

ज्यादातर मामलों में पीडि़त की आंख हमेशा के लिए खराब हो जाती है। इसके अलावा सांस के जरिए तेज़ाब फेफड़ों तक पहुंच गया, तो यह जानलेवा हो जाता है। जैसा, कि दो माह पूर्व मुंबई में प्रीति राठी के मामले में हुआ।

2-3 शुरुआती बड़ी सर्जरी के बाद कई सेकंडरी सर्जरी करनी पड़ती है। कई बार 30-30 सर्जरी भी। हर सर्जरी का खर्च 1-3 लाख रुपए।

लेकिन 3-4 साल भी इन्फेक्शन का खतरा है। झुलसी हुई त्वचा बाकी शरीर में इन्फेक्शन फैलाती है। जले हुए हिस्से पर त्वचा बनने से गठान उभर आती है।

कई बार घावों पर नारियल तेल लगा दिया गया। कंबंल लपेट दिया गया। जिसने उनके ठीक होने की संभावना पूरी तरह खत्म कर दी।

बर्न के आसपास डेड टिशू में इंफेक्शन फैलता है और यही घाव भरने नहीं देता। इंफेक्शन हादसे के महीनों बाद भी हो सकता है।
 तेज़ाब कोई हथियार तो नहीं पर किसी की ज़िंदगी हमेशा के लिए बर्बाद करने या किसी की जान लेने के लिए काफी होता है.

चिकित्सा क्षेत्र में तमाम प्रगति के बावजूद तेज़ाब से प्रभावित चेहरे को फिर से उसके मौलिक स्वरुप में नहीं लाया जा सकता . मेरा तो यह मानना है की ऐसी घटनाएं हमारे समाज को विकृत कर रही है और महिलाओं में खौफ पैदा कर रही है . भारत को हमेशा यह गर्व रहा है की भारतीय संस्कृति  ने महिलाओं को देवी का दर्जा दिया है और महिलाओं का स्थान काफी उंचा माना जाता रहा है …. जब ऐसी घटनाएं होती है तो संस्कृति के पहरेदारों को सामने आना चाहिए और इसका पुरजोर तरीके विरोध करना चाहिए …बल्कि पुरे समाज को इसके खिलाफ खड़ा होना चाहिए . 

Sunday, July 21, 2013

हम अपने अस्तित्व के लिए ही संकट खड़ा कर रहे हैं...

वाराणसी जिन दो नदियों वरुणा और असी से मिलकर बना था, उसमें एक नदी असी विलुप्त हो चुकी है ....


तराई की छोटी नदियां चीनी मिलों और उद्योगों के जहरीले कचरे का नाला बन गई हैं।


गोरखपुर की आमी नदी कभी अमृत जैसा पानी लोगों को देती थी, लेकिन अभी इसका पानी जहरीला हो चुका है...


हम अपने अस्तित्व के लिए ही संकट खड़ा कर रहे हैं...


आजादी के 66 साल बाद भी कश्मीरी अवाम का बाकी देश से वैसा संबंध कायम नहीं हो पाया है जो एक देश के नागरिकों में होता है।

114 साल पहले कश्मीर के पूर्व शासक महाराजा प्रताप सिंह ने वहां रेल चलाने की सोची थी।


विवाह 'लिव-इन' में रहने वाली स्त्री की भी पैतृक संपत्ति में कोई दावेदारी नहीं मानी जाती।

आधुनिक जीवन के साथ पुरुष समाज में नई चीजों के साथ समझौता करने की प्रवृत्ति पैदा हुई है।


पारंपरिक ईरानी मानते हैं कि कुत्ते नाजी होते हैं, उन्हें पालना ठीक नहीं है..


जब तक चिड़ियों के लिए संवेदना नहीं होगी तब तक उन्हें बचाने का कोई भी अभियान सफल नहीं होगा।

शहरों में जिस तरह से ऊंची इमारतें बन रही हैं वह गौरैयों के लिए घातक है।

कीटनाशकों के छिड़काव ने भी कई पक्षियों के लिए समस्याएं पैदा की हैं।

हम अपने अस्तित्व के लिए ही संकट खड़ा कर रहे हैं...

Monday, June 17, 2013

पत्रकारिता के लोकतांत्रिक पक्ष का क्षरण होता जा रहा है ...

आज पत्रकारों की बाढ़ आ गयी है .हर कोई अपनी पत्रकारिता के झंडे गाड़ना चाहता है .केवल ख्यालों में ही .अच्छे पत्रकार बनने के लिए काफी समर्पण की जरुरत होती है और उसके लिए गहन अध्ययन करना होता है .अपने विचारों को बिना किसी दबाव के रखना होता है और किसी भी मुद्दे पर संतुलित होकर अपने विचार रखने पड़ते है .समाज के प्रति जिम्मेदारी निभानी पड़ती है . एक पत्रकार दबाव समूह के अंग के रूप में काम करता है जो जनता की परेशानियों को सरकार के समक्ष जोरदार तरीके से रखता है .

आज तो ये गुण विरले ही मिलते है . सबको पैसा बनाने की जल्दी है . उनके पास तर्क भी है की अगर हम थोड़े भी ढीले हुए तो पीछे छुट जायेंगें और फिर दुबारा मौका नहीं मिलेगा .आखिर आजाद भारत में सबको पैसा बनाने की आजादी हासिल है तो हम क्यों पीछे खड़े रहे ?पैसे लेकर खबर छापना ,किसी ख़ास व्यक्तित्व की तरफदारी करना अधिकाँश पत्रकारों की पहचान बनती जा रही है .जानकारी भले ही न हो सनसनी बनाना तो सबको आता है .कारपोरेट घरानों की गोद में बैठकर खेलने में सोने चांदी के सिक्के बरसते है .सिक्के तो पाकर ये थोड़ी सी सुख सुविधा हासिल जरुर कर लेते है पर अपने पेशें को बेच डालते है .कोई कुछ नहीं कर सकता ,इनकी अपनी जिंदगी है ,जैसे चाहे जिए ...दुःख तो इस बात का है की पत्रकारिता के लोकतांत्रिक पक्ष का क्षरण होता जा रहा है .

Friday, April 5, 2013

दुनिया को कामसूत्र का ज्ञान देने वाला देश खुद अपने सेक्स से जुड़े मसलों को लेकर इतना असहाय हो गया!!!

महापुरुषों की मूर्तियाँ लगवाकर उनको भूल जाना और महान विचारों को किताबों तक सीमित कर देना हमारा पुराना शगल है!!!

महिला सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर हमारी छवि धूमिल ही हुई है।

16 दिसंबर 2012 कि उस स्याह रात का घटाटोप अंधेरा 2013 में भी कायम है!!!

दुनिया को कामसूत्र का ज्ञान देने वाला देश खुद अपने सेक्स से जुड़े मसलों को लेकर इतना असहाय हो गया!!!

भारत कई विरोधाभासों से भरा देश है!!!

Monday, March 18, 2013

कुछ प्रासंगिक सवाल -???




* मां-बाप का बेटों के प्रति अधिक मोह ही अक्सर उन्हें बेलगाम बनाता है!!

* एक सफल अर्थशास्त्री होने के बावजूद प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह अनर्थशास्त्री साबित हो 
 रहे हैं!!

* क्या सत्ता के शीर्ष स्तर पर फैले भ्रष्टाचार के कारण भारत की साख कलंकित नहीं हुई है?

* पुरुलिया हथियार कांड के अभियुक्त किम डेवी को भी डेनमार्क ने भारत भेजने से इनकार कर दिया था और तब भारत सरकार कुछ नहीं कर पाई थी!!

* चुनाव के मौके पर विचारों और सिद्धांतों के खंभे अचानक हिल उठते हैं!!

*चुनाव में तो विदेश नीति तक बदल जाती है!!

* राजनेताओं का आम आदमी की मुश्किलों से कितना जुड़ाव है???




ये सभी सवाल मेरे जेहन में उठ रहे है ,जो प्रासंगिक होने के साथ साथ सामयिक भी है। 

Thursday, March 14, 2013

आनंद !!


पानी में कंकड़ डालना अच्छा है । आनंद भी आता है ।
इन्तजार करने का बहाना भी है । ठीक है ...पर कभी कभी ही ।
पानी के लिए जगह ही न बचे । इतना मत डालना ।

Sunday, March 10, 2013

बजट में दूरदर्शिता की कमी


2013-14 का बजट उत्साहवर्धक नहीं है हालांकि यह पूरी तरह से चुनावी बजट भी नहीं है। बजट में बाजीगरी अधिक है एवं व्यापक दृष्टिकोण  का अभाव है। बजट के बहुत ही कम हिस्से में दीर्घकालिक विकास  की चिंता दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि  बिना किसी विशेष प्रयास और तैयारी के ही बजट को प्रस्तुत कर दिया गया। निर्भया  फंड की व्यवस्था कर दिल्ली गैंग रेप से उपजे आक्रोश को दबाने की नाकाम कोशिश की गयी है। इसमे दिखावा ज्यादा है वास्तविक धरातल पर काम करने का ज़ज्बा कम। मात्र 1000 करोड़ रुपये के फंड से महिलाओं की सुरक्षा कैसे की जा सकती है और फिर क्या  महिला सुरक्षा का मुद्दा केवल फंड या पैसे से ही सम्बंधित  है ? गहराई से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि  वास्तविक समस्या तो दूसरी है अतः समस्या की जड़ तक पहुँचना  ज्यादा जरुरी है। सबसे मुख्य बात इस फंड के पैसे का  भविष्य में उपयोग कैसे  किया जाता है ?

इसी तरह बजट में महिलाओं के लिए एक अलग बैंक स्थापित करने की घोषणा की गयी है। इस घोषणा से भी महिला आक्रोश को भुनाने की कोशिश की गयी है। यह वास्तविक धरातल पर कारगर कैसे होगा, इस विषय पर चिंतन की कमी झलकती है। इसकी रूपरेखा पर काफी काम करने की जरुरत है। निष्पक्ष तरीके से विश्लेषण किया जाय तो ऐसा लगता है कि इसकी  कोई जरुरत नहीं थी। उपलब्ध बैंकिंग संस्थाओं में ही सुधार कर महिलाओं की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है । महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढाने के लिए या उनको बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने के लिए अलग बैंक बनाने की आवश्यकता नहीं है बल्कि इसके लिए राजनितिक इच्छा शक्ति का  होना आवश्यक  है। ऐसा लगता है कि महिलाओं को कुछ देने के नाम पर सिर्फ बयानबाजी की गयी है। 97,000 करोड़ महिला विकास के लिए इस बजट में रखा गया है। देखते है, भविष्य में इसका कितना उपयोग हो पता है। कुल मिला कर बजट महिलाओं के साथ साथ आम आदमी की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा।
खाद्य सुरक्षा पर सरकार थोड़ी गंभीर दिख रही है। खाद्य सुरक्षा के लिए बजट में 10,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। कुल आबादी का लगभग 67.5 प्रतिशत लोगों को इससे लाभ मिलने की बात की जा रही है। ग्रामीण क्षेत्र की 75प्रतिशत आबादी तथा शहरी क्षेत्र की 50 प्रतिशत आबादी इससे लाभान्वित होगी। इसके लिए सरकार बधाई की पात्र है। परन्तु इसका हस्र वैसा नहीं होना चाहिए जैसा मनरेगा का हुआ। एक व्यापक रणनीति के साथ सभी मुद्दों का अवलोकन करने  के बाद ही इसे लागू किया जाना चाहिए। अन्यथा इसका लाभ वंचित वर्ग को नहीं मिलेगा। 2014 के आम चुनाव को ध्यान में रख कर सरकार अगर इसे जल्बाजी में लागू करती है तो फिर इससे भुखमरी की समस्या तो हल नहीं होगी उलटे यह योजना  भी सरकार के लिए एक बोझ बन जायेगी।
पूर्ण खाद्य सुरक्षा को हासिल करने के लिए कृषि में निवेश बढाने के साथ साथ वैज्ञानिक  तरीकों का भी प्रयोग करना होगा। द्वितीय हरित क्रान्ति खाद्य सुरक्षा की दिशा में सबसे कारगर साबित हो सकता है क्योंकि इसमे कार्बनिक खेती का प्रावधान है जो पर्यावरण हितैषी है। इसमे उन क्षेत्रों पर फोकस किया गया है जिन्हें प्रथम हरित क्रांति में अनदेखा कर दिया गया था। साथ ही इसमे सीमांत कृषकों पर भी पर भी फोकस किया गया है। खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि के साथ साथ खाद्यान्न वितरण एवं उसके भंडारण पर भी ध्यान देना होगा।अधिक पैदावार भी आज सरकार के लिए मुसीबत बन जाता है क्योंकि  भण्डारण गृह  के अभाव में उनका उचित रख रखाव नहीं हो पता और वे सड़ जाते है। कई बार सड़ा हुआ खाद्यान्न ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से  गरीबों  को खाने के लिए दे दिया जाता है।
फ्लैगशिप योजनाओं पर से सरकार का ध्यान कम हुआ है। इन योजनाओं के लिए बजट में आवंटन घट गया  है। वर्तमान में मंहगाई की दर 10.79 फीसदी है अतः इसे शामिल करने पर वास्तविक स्थिति का निर्धारण हो जाता है।  ऐसा लगता है कि सरकार का खाद्य सुरक्षा प्रेम फ्लैगशिप योजनाओं पर भारी पड़  रहा है। महाराष्ट्र में सुखा पड़ा है और बजट में इसके लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है। प्रत्येक वर्ष देश के किसी न किसी हिस्से में सुखा का प्रकोप पड़ता ही है अतः इससे  निपटने के लिए दीर्घकालिक नीति की सख्त जरुरत है। ग्रामीण विकास मंत्रालय को 80 हजार करोड़ का आवंटन किया गया है। यह पिछले साल के बजट के आवंटन से 5.1 प्रतिशत ज्यादा है। इसी प्रकार कृषि मंत्रालय को 27 हजार करोड़ रुपये का आवंटन हुआ है।यह पिछले साल से 8.2 प्रतिशत ज्यादा है। अगर इन पैसों का सही इस्तेमाल किया जाता है तो कृषि एवं ग्रामीण विकास में काफी मदद मिलेगी।

बजट से सबसे ज्यादा निराश कर दाता  वर्ग हुआ है।वह एक बड़ी छुट की उम्मीद कर रहा था जबकि उसे मात्र दो हजार की राहत ही  मिल पायी है और यह सिर्फ उनके लिए है जिनकी वार्षिक आमदनी पांच लाख रुपये से कम है। बजट में बुजुर्गों की भी अनदेखी की गयी है। उन्हें कुछ नहीं दिया गया है। ऐसा ही हाल महिलाओं का भी है।मंहगाई की रोकथाम के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया है।वित् मंत्री जी के आशा व्यक्त करने से ही मंहगाई रुकने वाली नहीं है।खाद्य मुद्रास्फीति के तो बढ़ने के आसार दिख रहे है।एक्साइज ड्युटी  12 प्रतिशत पर बरकरार रखा गया है अतः रोजमर्रा के सामान के दाम भी नहीं घटने वाले।
बजट में सुरक्षा का ध्यान रखा गया है।वित् मंत्री ने आतंकवाद से निपटने के लिए नेट ग्रिड योजना और प्रोजेक्ट सीसीटीएन को पर्याप्त पैसा दिया है। एनआईए  की मजबूती के लिए अधिक धनराशि  का आवंटन किया गया है। यह एक अच्छा कदम है परन्तु आजकल के घोटालों के वातावरण में यह ध्यान रखना अति आवश्यक है कि  इनका इस्तेमाल समयबद्ध और सही तरीके से हो, नहीं तो इस आवंटन का कोई फायदा नहीं होने वाला।

बच्चों के विकास के लिए बजट में 77 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था की गयी है। पांच करोड़ युवाओं को कामकाज का प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा गया है।इसके  अतिरिक्त स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी पिछली बार की अपेक्षा अधिक धन का आवंटन हुआ है। ये सब बजट में शामिल सकारात्मक तत्व है। फिर भी बजट का अवलोकन करने पर यह प्रदर्शित होता है की बजट दूरगामी  प्रभाव नहीं छोड़ता क्योंकि इसमें दूरदर्शिता का अभाव है। बजट का भारतीयकरण होना बहुत जरुरी है। क्योंकि भारत की भौगोलिक ,सामजिक एवं आर्थिक स्थिति भिन्न प्रकार की है अतः इसकी आर्थिक  चुनौतियां भिन्न प्रकार की है। केवल विदेशों से आयातित योजनाओं को लागू कर देने से ही भारत का विकास नहीं हो सकता। सतत विकास के लिए देशी अर्थव्यवस्था की समझ होना अनिवार्य है।  भविष्य में बजट निर्मित करने से पहले व्यापक अनुसंधान एवं विचार विमर्श किया जाय। भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक समस्याओं को समझा जाय। अन्यथा बजट अपनी  प्रासंगिकता खो देगा।

Friday, February 22, 2013

कोई गम क्यों नही ?


इन्तजार करना नही
अनुसरण का स्वभाव नही
कोई गिला शिकवा नही
कोई वादा भी नही
उपहास करना आदत नही
और सुनना भी नही
बहुत निराशा भी नही
ज्यादा आस भी नही
तब क्यों कुछ ठीक नही ?

बोझिल मन और भारी कदम है
लगता दिल में कोई गम है
कुछ तो हुआ है ?
जिंदगी ठहर सी गई है
उमंगें लूट सी गई है
गम होकर भी लगता ,
कोई गम नही
यही तो सबसे बड़ा गम है ,
कोई गम क्यों नही ?

Saturday, November 10, 2012

सब सपना


ठंडी हवा
एक महक
कुछ बातें
ये नजारें

पर्वत
नदियाँ
सब सपना
और कुछ नही